Essay On Sada Jeevan Jach Vichar

सादा जीवन उच्च विचार

Sada Jivan Uchch Vichar

इस तरह की सहजता, स्वाभाविकता बहुत बड़ा गुण है। परंतु आज का युग प्रदर्शन और कृत्रिमता का युग बनकर रह गया है। आज तडक़-भडक़ को ही विशेष एंव अधिक महत्व दिया जाने लगा है। तन पर पहनने वाले कपड़े हों या घरों-दफ्तरों के उपकरण और उपयोगी सामान सभी जगह प्रदर्शनप्रियता के कारण कोरी चमक-दमक का बोलबाला है। सादगी और सादे लोगों को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता। हमारे विचार में इसी का दुष्परिणाम पूरे समाज के नैतिक पतन, भ्रष्टाचार एंव अराजकता के रूप में हमारे सामने आ रहा है। चारों तरफ अशांति, आपाधापी और लूटपाट का बाजार गरम है। बड़े-छोटे का कोई विचार, भेद और सम्मान नहीं रह गया। भौतिक साधनों और तडक़-भडक़ को पाने के लिए दूसरों के पांव घसीट और उन्हें नीचे गिराकर सब आगे बढ़ जाना चाहते हैं। लाखों-करोड़ों रुपए कमाकर भी तृष्णांए शांत नहीं हो पातीं। और-ओर की प्यास बढ़ती ही जा रही है। ऐसा करने वाले लोग अपनी भटकी चेतनाओं का बहाव देखते और समझते भी हैं। कई बार इन स्थितियों से छुटकारा पाने की बात सोचते भी हैं पर छुटकारा प्राप्त नहीं कर पाते। प्रश्न उठता है क्यों? आखिर क्यों छुटकारे के स्थान पर तृष्णाओं का अनंत विस्तार होता जा रहा है? क्यों लोग भाई तक का गला काट लेना चाहते हैं। दूसरे को नोच-खसोट कर खुद सजना-संवरना ओर बनाना चाहते हैं। न चाहते हुए, इन सबके दुष्परिणामों से परिचित रहते हुए भी क्यों लोग इसी राह पर अंधाधुंध भागे जा रहे हैं? चाहकर भी छूट क्यों नहीं पाते? सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि जब तक लोग व्यर्थ की तडक़-भडक़ से बचकर, इच्छाओं का विस्तार रोककर सहज जीवन जीवने की आदत नहीं डालते, तब तक इस विषमता से छुटकारा नहीं। यही सोचकर तो महापुरुषों ने यह मूलमंत्र दिया है :

‘सादा जीवन, उच्च विचार।’ अर्थात सादगी भरा रहन-सहन, खान-पान और अन्य प्रकार के जीवन-व्यवहार बनाने पर ही आदमी के मन में अच्छे भाव और विचार आ सकते हैं। वे सादगी भरे उच्च विचार ही व्यक्ति के जीवन का उच्च और महान बना सकते हैं। विचारों और व्यवहारों को उचच बना लेने पर ही मनुष्य को उस वास्तविक सुख-शांति की प्राप्ति संभव हो सकती है कि जिसकी खोज में वह दिन-रात मारा-मारा, भटकता फिरता और चारों ओर मार-धाड़ करता रहता है। जिसे मोक्ष या मुक्ति कहते हैं, मरने के बाद तो पता नहीं वह कभी किसी को मिल पाती है कि नहीं परंतु जीते-जी मनुष्य मोक्ष या मु िकत की अनुभूति अवश्य पा सकता है। वह सादे जीवन और विचारों में उच्चता यानी स्वरूपता आने पर ही संभव हो सकती है। इस तथ्य को हर देश के मनीषी ने भली प्रकार समझा है। तभी तो अपनी-अपनी भाषा और अपने-अपने ढंग से सभी ने इस तथ्य को उजागर करने का व्यावहारिक प्रयास किया है। हमारे देश को अहिंसा के असत्य से स्वतंत्र कराने वाले महात्मा गांधी का जीवन कितना सादगीपूर्ण था। एक लंगोटी और ऊपर से एक चादर, वह भी अपने हाथों से काती-बुती खादी की। उनका आहार-विहार भी एकदम सादा था। वह मोटा खाते, मोटा पहनते और बकरी का दूध पीकर संतोष कर लिया करते थे। उनके विचार भी रहन-सहन और खान-पान के समान ही सादे थे पर बहुत उच्च और महान। उन उच्च एंव महान विचारों के बल पर ही तो वे ‘विश्वबंध्य बापू’ होने का अंतर्राष्ट्रीय मान-सम्मान प्राप्त कर सके। देश की जनता में जागृति उत्पन्न कर, उसे संगठिन बनाकर स्वतंत्रता के लक्ष्य तक पहुंचा सके। तभी तो उनका जीवन ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के मुहावरे को साकार करने वाला स्वीकारा जाता है। सारा संसार उन्हें महत्व देता और पूजता है। क्या इस उदाहरण और आदश्र से इस कथित मुहावरे का वास्तविक अर्थ एंव उद्देश्य स्पष्ट उजागर नहीं हो जाता?

अंग्रेजी के विद्वान और भौतिकता को महत्व देने वाले अंग्रेज भी इसका महत्व समझते थे। तभी तो उन्होंने भी सिंपल लीविंग एंड हाई थिंकिंग का उदघोष करके वही सब भाव प्रकट किया जो ‘सारा जीवन उच्च विचार’ का मुहावरा प्रकट करता है। कहावत है कि जैसा खाता अन्न, वैसा होता मन! अर्थात जब हम अराम का खाते-पीते हैं, तो हमारा मन भी हरामी हो जाता है। वह इधर-उधर भटकाकर मनुष्य को यदि जीवन नहीं तो बेजान मशीन अवश्य बना देता है। तभी तो वह स्वंय बेचैन रहकर दूसरों को भी बेचैन रखता है। इसके विपरीत, सादे खान-पान से व्यक्ति का व्यवहार, आचार-विचार भी सादा रहता है। सादगी से मन-कर्म में संतोष आता है। संतोष्ज्ञ आदमी को न तो पशु बनने देता है और न जड़ मशीन ही। वह महज आदमी रहकर ऐसे कार्य करता है, जिससे उसका अपना तो हितल्-साधन होता ही है, यथासंभव पूरे समाज और समूची मानवता के हित-साध्य का प्रयास भी उसमें समाया रहता है। सादगी और विचारों की उच्चता के इस सहज स्वाभाविक पाठ को आज हम भूल गए हैं। अपने-आपको कहने को तो सभ्य सुसंस्कृ कहते हैं, पर यह सब महज दिखावा ही होता है। हमारे भीतर छिपा और पनप रहा पशु हमें मनुष्यता के सहज स्तर पर कभी भी खड़े नहीं रहने देता। तभी तो आज चारों तरफ अराजकता और अशांति का राज है। असहिष्णुता ओर मार-धाड़ है। कहीं संप्रदाय और धर्म के नाम पर आदमी को बरगलाया जा रहा है, कहीं राजनीति और व्यापार के नाम पर भडक़ाया जा रहा है। फलस्वरूप दंगे-फसाद होते हैं, सीमा-संघर्ष और युद्ध तक हो जाते हैं। तृष्णा और अशांतियों के क्षेत्र का और भी विस्तार हो जाता है। निश्चय ही थोड़ा-सा प्रयत्न करके ही उन सब दुष्कर्मों और दुष्प्राभावों से बचा जा सकता है। उसका रास्ता ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के निहितार्थ में से ही बनता और जाता है।

हम सब मनुष्य हैं। मनुष्य होने के नाते हम सबको जीवन की सामान्य आवश्यकता-पूर्ति के उपकरण सहज भाव से पाकर जीवन जीने का अधिकार है। इस अधिकार को पाने का हमारे विचार से मात्र एक ही उपाय या एक रास्ता है। वह है सादा जीवन, उच्च विचार, अन्य कोई नहीं। इसी से मानव और समाज सभी का हित-साधन संभव हो सकता है।

July 19, 2017evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo CommentHindi Essay, Hindi essays

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